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चित्तौड़गढ़ & जैन धर्म - 13. श्री केसरियाजी जैन गुरूकुल

Published on Saturday, January 20, 2018 by Dr A L Jain

श्री केसरियाजी जैन गुरूकुल की स्थापना व पूज्य श्री कल्याण सूरिश्वरजी म. सा. की प्रेरणा एवं सेठ मोहोलाल मगनलालजी के प्रयत्नों से चैत्र शुक्ला त्रयोदशी सम्वत् 2003 को महावीर जन्म कल्याणक के अवसर पर भूपाल सागर (करेड़ा पाश्र्वनाथ) में उपस्थित पूज्य मुनिगणों के बीच की गई एवँ कई छात्रों को प्रवेश दे दिया गया, लेकिन कुछ ही महीनों में यह आभास हो गया कि यहाँ की शुगर फैक्ट्री की वजह से बदबू एवं मच्छर पूरे वातावरण मंे रहते है, अतः स्थान परिवर्तन पर विचार किया गया। एक सदस्य ने कहा कि गुरूकुल के लिए आचार्य विजयनीति सूरिजी की प्रबल भावना मेवाड़ में चित्तौड के लिए थी। अतः इस पर सहमति बनी कि इस सत्र में इसे चित्तौड़ शहर में हाथी भाटा, उपरला पाडा में वालचन्द्र जी यति की हवेली में स्थानांतरित कर दिया जावे व संस्था की अपनी जगह किसी उपयुक्त स्थान पर क्रय कर स्वयं का भवन निर्माण किया जावे।

ग्यारह वर्ष तक यह संस्था यतिजी की हवेली में ही चलती रही। तत्पश्चात् सेठ भगुभाई सुथरिया के आर्थिक सहयोग से रेल्वे स्टेशन के सम्मुख वर्तमान स्थल को 48000/- रुपया में खरीद कर निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया। तत्कालीन गृहपति श्री फतेहलालजी महात्मा बहुत कर्मठ, समर्पित व विद्वान व्यक्ति थे। उनके सहयोग से विद्यालय भवन बनकर सुचारु रूप से नये प्रांगण में प्रारंभ हो गया। समय के साथ-साथ कमेटी के कई सदस्य देवलोक हो गये व बाकी सदस्यों ने बम्बई से दूरी के कारण स्थानीय सदस्यों से कार्यभार संभालने हेतु अनुरोध किया। इस पर बम्बई के श्री दीपचन्दजी चैकसी की अध्यक्षता में स्थानीय कमेटी का गठन श्री मन्नालाल जी घीया जावद को अध्यक्ष बनाकर किया गया, जिसमें जावद, नीमच, निकुंभ, प्रतापगढ़, धमोतर आदि स्थानों के प्रबुद्ध सक्रिय लोगों को लिया गया।

श्री नाथूलालजी दक व श्री राजमलजी रांका का शिष्टमंडल धन संग्रह हेतु पूरे देश में घूमा एवं मुनि भगवंतों के सहयोग से आवश्यक धन संग्रह हो गया, जिससे दुकानें व छात्रावास हेतु कमरे व अतिथि गृह बनाये गये। इसका उद्घाटन स्वर्गीय सेठ श्री मोहोलालजी की धर्मपत्नी श्रीमती रसीला बेन व उनके पुत्र श्री हेमन्त कुमारजी के करकमलों द्वारा हुआ। समय के साथ-साथ छात्रावास में अभिभावकों की रुचि कम होने से छात्रों की संख्या घटती गई। छात्र संख्या बढ़ाने हेतु दिनांक 6.5.1979, 13.9.1981 एवं 10.6.82 की बैठकों में विद्यालय प्रारंभ करने हेतु प्रस्ताव पारित होते रहे। अन्त में अध्यक्ष श्री कन्हैयालाल जी महात्मा के अथक प्रयासों से सन् 1984-85 में कुल 66 विद्यार्थियों के प्रवेश के साथ विद्यालय का श्रीगणेश हुआ। सन 1997 में प. पूज्य आचार्य श्री रेवतविजय जी एवं प. पूज्या साध्वी श्री चन्द्रकलाश्री जी की प्रेरणा से 11 नये कमरों का निर्माण हुआ। इसी बीच सौभाग्य से श्री हीरालाल जी दोशी एवं श्री कन्हैयालाल जी महात्मा का संपर्क समाज के आस्थापुंज पुण्यात्मा श्री कुमारपाल भाई वी. शाह से हुआ और फलस्वरूप उनके आशीर्वाद से यह विद्यालय ‘‘आचार्य श्री भुवनभानूसूरि माध्यमिक विद्यालय’’ के नाम से आकार ग्रहण कर तरक्की की राह पर चल पड़ा एवं विद्यालय ...... वी कक्षा तक क्रमोन्नत हो गया।

श्री कन्हैयालाल जी महात्मा, श्री राकेश जी जैन एवं डाॅ. ए. एल. जैन की सक्रिय सहभागिता से ...... वर्ष पूर्ण होने पर गुरुकुल की स्वर्ण जयन्ती भव्य स्तर मनाने हेतु निश्चय किया गया एवं इस हेतु आप तीनों के अलावा श्री हीरालाल जी दोशी, श्री मनोहरलाल जी विराणी एवं श्री सुशील कुमार जी चैधरी की एक संचालन समिति का गठन किया गया। दिनांक 6 से 8 नवम्बर 1998 के बीच भव्यातिभव्य त्रि-दिवसीय कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें अहमदाबाद, मुंबई, सूरत आदि स्थानों के दानवीर श्रेष्ठी एवं संस्था के 56 गाँवों व शहरों के सदस्यगणों ने भागीदारी की। समारोह की अध्यक्षता हेतु शेठ आनंद जी कल्याण जी पेढ़ी अहमदाबाद के अध्यक्ष एवं देश के प्रमुख उद्योगपति व हार्वर्ड विश्व विद्यालय के प्रथम भारतीय एमबीए सेठ श्री श्रेणिक भाई जैसे प्रभापुंज अपने पूरे परिवार एवं मित्रों सहित इस भव्य कार्यक्रम के गौरव एवं साक्षी रहे। समाज के आस्था केन्द्र श्री कुमारपाल भाई वी. शाह तो इस पूरे कार्यक्रम के नीति निर्माताओं मंे से एक थे ही।

स्वर्ण जयन्ती समारोह मंे पधारे दानवीर श्रेष्ठियों का बाद के वर्षों में आज तक गुरुकुल में लगातार सहयोग बना हुआ है। सन् 1939 से दिवंगत श्री अभयकुमार जी विराणी नये अध्यक्ष, एवं श्री सुशील कुमार जी चैधरी सचिव मनोनीत हुए। आपके कार्यकाल में संस्था का क्रमोन्नयन 10 वीं कक्षा से 12 वी कक्षा तक हुआ। नई विंग का निर्माण हुआ एवं छात्रों की संख्या में बढोतरी हुई। सन् 2006 से संस्था के अध्यक्ष पद पर श्री शांतिलाल जी राठौड़ एवं श्री मनोहरलाल जी मेहता सचिव मनोनीत हुए। सन् 1999 से 2012 तक श्रीमती जै कुंवर बेन अमृतलाल रामजी भाई-शाह मुंबई, श्री सुशील भाई, नरेन्द्रभाई शाह, श्रीमती धात्रिका बेन, कमलेश भाई शाह अहमदाबाद एवं श्रीमती लीलाबेन रणछोडदास, शेष करण भाई के आर्थिक सहयोग से परिसर में विभिन्न विंग्स का निर्माण इनके कार्यकाल मंे हुआ। प्रार्थना स्थली को फाइबर शीट से ढ़कने इसकी सुन्दरता की अभिवृद्धि एवं धूप-वर्षा से सुरक्षा हुई है।

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Chapters (चित्तौड़गढ़ & जैन धर्म)

  1. जैन धर्म का गौरव स्थल
  2. जैन श्रद्धालु
  3. पूजित जिन मंदिर
  4. महान जैन आचार्य
  5. दानवीर जैन श्रेष्ठी
  6. चित्तौड़ में रचित जैन साहित्य
  7. शिलालेख एवं प्रशस्तियाँ
  8. रोचक एवं ऐतिहासिक तथ्य
  9. परिशिष्ट
  10. चित्तौड़गढ़ दुर्ग का गाइड मेप
  11. भक्तिमती मीराबाई
  12. जैन धर्मशाला
  13. श्री केसरियाजी जैन गुरूकुल

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1 Comments

Praful Chandanmal ji Salgia
1. Praful Chandanmal ji Salgia  Mar 9, 2018 18:54 I Like It. | I Don't Like It. | Report Abuse Reply
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