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चित्तौड़गढ़ & जैन धर्म - 4. महान जैन आचार्य

Published on Friday, January 19, 2018 by Dr A L Jain | Modified on Monday, February 19, 2018

विक्रमी शताब्दी पूर्व से ही चित्तौड़ जैनाचार्यों का आकर्षण केन्द्र रहा, जिसके कारण यहाँ के सामाजिक वातावरण में अहिंसा व समभाव का प्रभाव स्पष्ट रूप से पाया जाता है। 136 ई. पूर्व जैनाचार्य देवगुप्त सूरि एवं ई. 158 से 178 तक यज्ञदेव सूरि के इस क्षेत्र में विचरण का उल्लेख मिलता हैं।

15 वीं शताब्दी तक चित्तौड़ युगप्रधान जैनाचार्यों की विहार भूमि रहा है। मथुरा एवं ठेठ दक्षिण से अनेकानेक आचार्य चित्तौड़ प्रवार पर आते रहे है, जिनमें प्रमुखतः दिगम्बर साधु रहे है। विक्रम की पांचवी शताब्दी में भी सिद्धसेन दिवाकर जिन्हें सम्राट विक्रमादित्य की सभा का रतन बनने का गौरव प्राप्त हुआ था, यहाँ विद्याध्ययन एवं लेखन के लिए रहे थे। 9 वी शताब्दी में आचार्य कृष्णार्षि नामक साधु बड़े विख्यात हुए, जिन्होंने कइयों को जैन धर्म में दीक्षित किया था।

भट्ट ब्राह्मण कुल में जन्मे युगान्तरकारी आचार्य श्री हरिभद्र सूरि (ई. 700-770) चित्तौड़ के मूल निवासी थे, जिन्होंने 1444 ग्रंथों की रचना की एवं अपनी विद्वता की ऐसी छाप छोड़ी कि उनके ग्रन्थ हमेशा के लिए जैन दर्शन एवं चारित्र के नियामक बन गए।

जिनसेन आचार्य के गुरू वीरसेन आचार्य हुए जिन्होंने कई ग्रंथों की रचना की। आचार्य हरिषेण नामक जैन विद्वान ने (ई. 987) धम्म परिक्खा नामक ग्रंथ लिखा। आचार्य जिनवल्लभसूरि के चित्तौड़ में देवलोक गमन के उपरान्त ई. 1112 में धोलका निवासी सोमचंद्रगणि ने चित्तौड़ दुर्ग पर ही आचार्य पद ग्रहण किया एवं आचार्य जिनदत्त सूरि के नाम से विख्यात हुए। इस आयोजन में स्वयं धोलका नरेश अपनी मंत्री परिषद् के साथ उपस्थित हुए थे। जिनदत्त सूरि खरतरगच्छ के बड़े प्रभावशाली आचार्य सिद्ध हुए, जिनका देवलोक अजमेर में हुआ।

ई. 1253 में जन्मे आचार्य सोमप्रभसूरि द्वारा मात्र 11 वर्ष की आयु में दीक्षा लेकर 22 वें वर्ष में सूरि पद प्राप्त करने का उल्लेख है। उन्होंने कई ग्रंथ लिखकर बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त की। जिनप्रभ सूरि जी के मोहम्मद तुगलक से सम्मानित होने का उल्लेख मिलता है। आचार्य धर्मरत्नसूरि शत्रुंजय की ओर जाते हुए संघ लेकर चित्तौड़ से गुजरे तब महाराणा सांगा ने उनकी अगवानी की थी।

उपर्युक्त मुनियों/आचार्यों के अलावा चित्तौड़गढ़ कई अन्य मुनियांे की जन्मस्थली या कर्मस्थली रहा है। आठवी शताब्दी में उद्योतनसूरि (कुवलयमाला की रचना की), 10 वीं शताब्दी में महाकवि डड्ढा (प्राकृत भाषा निबद्ध जिनमें पंच संग्रह आदि), 12 वीं शताब्दी में वादिदेवसूरि, रामकीर्ति, (समिद्धेश्वर प्रशस्ति), देवभ्रदसूरि (जिन्होंने शास्त्रार्थ में भागवत शिवूर्ति को पराजित किया था), 14 वीं शताब्दी में जिनभ्रदसूरि, जिनप्रभसूरि, रत्नाचार्य, 15 वीं शताब्दी में चारित्र सुन्दरगणि (महावीर जैन मंदिर प्रशस्ति), जिन हर्षगणि (वस्तुपाल चरित्र), पट्मनाथ, ऋषिवर्धनसूरि (नल दमयंती रास), वाचक सोमदेव (इनकी विद्वता की तुलना सिद्धसेन दिवाकर से की जाती।) हीरानंदसूरि, सोमसुनदरसूरि (कई मंदिरांे का निर्माण/जीर्णोद्धार करवाया), राजशील (विक्रीम खापर चरित्र) शुभचन्द्र, 16 वीं शताब्दी में विजयसेनसूरि, गजेन्द्रप्रमोद (चित्तौड़ चैत्य परिपाटी), सिद्धिचन्द्र, जिनचन्द्रविजय, भानुचन्द्र, 17 वीं शताब्दी में धर्मदास, 18 वी शताब्दी में साध्वी सतीश्वेता चित्तौड़ गजल आदि का उल्लेख इतिहास एवं अभिलेखों में मिलता है।

एक लम्बे अन्तराल के बाद बहुत प्रभावशली आचार्य श्री विजयनीति सूरि हुए जिनकी प्रेरणा से चित्तौड़गढ़ में स्टेशन रोड़ की जैन धर्मशाला एवं जैन गुरुकुल की स्थापना हुई। दुर्ग पर श्रृंगार चंवरी एवं सातबीस देवरी का जीर्णोद्धार हुआ। सातबीस देवरी मन्दिर की प्रतिष्ठा हेतु पधारते हुए बीच में अचानक एकलिंग जी में आपका देवलोक माघ वदी तीज सम्वत् 1998 को हो गया। इस आघात के बाद भी सातबीसदेवरी मंदिर की प्रतिष्ठा आचार्य जी द्वारा प्रदत्त मुहुर्त पर ही उनके शिष्य विजयहर्षसूरीश्वर द्वारा माघ सुदी बीज संवत् 1998 को सम्पन्न करवाई गई।

ई. 1971 में चित्तौड़ पधारे पद्मश्री मुनि जिनविजय जैसे विद्वान चिंतक ने अपना अन्तिम जीवन चित्तौड़ को ही समर्पित कर दिया था। शताब्दियों पुरानी विरासत और राजस्थान एवं गुजरात के हस्तलिखित साहित्य को प्रकाश में लाने एवं उनका सम्पादन व प्रकाशन करने का श्रेय मुनि जिनविजय जी को ही जाता है। चित्तौड़गढ़ को कार्यक्षेत्र बनाने वाले महान आचार्यों में आचार्य हरिभद्रसूरि, आचार्य जिनवल्लभसूरि, आचार्य जिनदत्तसूरि एवं आचार्य विजयनीति सूरीश्वर के बाद मुनि जिनविजयजी ही है, जिन्होने चित्तौड़गढ़ को अपना कार्यक्षेत्र बनाकर आचार्य हरिभद्रसूरि मन्दिर एवं अन्य संसथाएँ बनवाई। (चारों हान आचार्यों एवं पद्मश्री मुनि जिनविजय जी को श्रद्धांजलि स्वरूप अलग से जानकारी संलग्न की जा रही है।)

मुनि जिनविजय जी के बाद चित्तौड़गढ़ क्षेत्र को जैन श्रेष्ठ प्राणि मित्र, करुणा के सागर माननीय कुमारपाल भाई वी, शाह का एवं उनके सहयोगियों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ, जिनके संबल से चित्तौड़गढ़ के श्रावक, तीर्थ एवं संस्थाएँ लहलहा उठी।

1. आचार्य श्री हरिभद्रसूरि जी

चित्रकूट (चित्तौड़) के ब्राह्मण परिवार में माता गंगा एवं पिता शंकर भट्ट की संतान के रूप में वि. सं. 757 (सन् 700) में जन्मे हरिभद्र की पहचान विश्व के महान तत्व दृष्टा, उद्भट विद्वान आचार्य श्री हरिभद्रसूरि के रूप में हुई। अपने समय के शिखर सनातनी विद्वान के रूप में अप्रतिम प्रतिष्ठा अर्जित कर राजपुरोहित हरिभद्र स्वज्ञानाभिमान से इतने आप्लावित हो गये थे कि उन्होंने प्रतिज्ञा ले ली थी कि ‘‘सृष्टि में अगर किसी का कथन मै समझ न सकूँ तो उसका शिष्यत्व अंगीकार कर लूंगा’’।

एक बार एक उपाश्रय के समाने से गुजरते हुए उन्हें साध्वी श्री याकिनी महत्तरा के मधुर कण्ठ से निःश्रत ‘‘चक्कि दूगं.....’’ गाथा कान में पड़ी, जो ‘क्षेत्र समास’ ग्रंथ की एक गाथा थी। बहुतेरी कोशिशों के बाद भी अर्थ समझ में न आने पर हरिभद्र ने साध्वीश्री से अर्थ समझाने का अनुनय किया, तब साध्वी याकिनी महत्तरा ने उन्हें आचार्य श्री जिनदत्त के पास भेजा। आचार्य श्री से गाथा का अर्थ जानकर हरिभद्र ने जैन धर्म अंगीकार किया एवं अपने पंथ एवं हृदय परिवर्तन की निमित्त बनी साध्वी याकिनी महत्तरा को अपनी धर्म माता के रूप में स्वीकार किया। प्रवज्या ग्रहण के बाद आचार्य हरिभद्र का कायाकल्प हो गया। वे विनम्र, सुशील व एक तपस्वी महात्मा बन गये। मिथ्याभिमान दूर हो गया और जैन आगमों के सूक्ष्म अध्ययन पर उनके मुँह से निकला ‘हा अणाहा कहं हुंतो, जई न हुंतो जिणागमो’ अर्थात् ‘हम अनाथ हो जाते अगर हमें जिनागमों की प्राप्ति न होती’।

आचार्य हरिभद्र वैदिक, बौद्ध एवं जैन दर्शन के प्रकाण्ड विद्धान होने के बावजूद किसी दर्शन के प्रति कटु नहीं हुए। उनके हृदय में अनेकान्त का दर्शन प्रतिरोपित हो चुका था, इसीलिए अपने युग की संकुचित एवं अनुदार दृष्टि से ऊपर उठ कर उनका साहित्य अनेकान्त से पल्लवित समन्वयवादी समदृष्ट साहित्य है। उन्होंने कथा, उपदेश, योग, दर्शन आदि के रूप में 1444 ग्रंथों की रचना की। इन ग्रंथों में प्राकृत एवं संस्कृत की मिश्र सम-संस्कृत भाषा में 1,50,000 से अधिक श्लोकों की रचना हुई है। उनके उपलब्ध प्रसिद्ध ग्रंथों में समराइच्च कहा, शास्त्र वार्ता समुच्चय, योग शतक, योग बिन्दु, योग दृष्टि समुच्चय, योग शतक आदि है।

शिथिलाचार जो भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात् छोटे से छेद के माध्यम से प्रविष्ट हुआ था। आचार्य हरिभद्र सूरि के समय तक पहुँचते-पहुँचते विराट रूप धारण कर चुका था। आचार्य हरिभद्र ने शिथिलाचार के विरोध में सर्व प्रथम आवाज उठाई एवं ‘‘सम्बोध प्रकरण’’ आदि ग्रंथों में इसकी निन्दा की। उनके ग्रंथों पर देश-विदेश में कई विद्वान शोध कर चुके है एवं आज भी निरंतर शोध जारी है।

आचार्य श्री हरिभद्र की नश्वर देह आज इस दुनिया में नहीं है फिर भी उनके 1444 शास्त्र शिष्य अपने रचयिता का यशोगान भविष्य में भी करते रहेंगे।

2. आचार्य जिनवल्लभसूरि जी

खरतरगच्छ पट्टावली के अनुसार जिनवल्लभसूरि चित्तौड़गढ़ के निवासी थे। आपका जन्म वि. सं. 1090 में हुआ था। प्रारंभ में आप चैतयवासी थे, पर बाद में चैत्यवासियों की शास्त्र विरोधी गतिविधियों के कारण आपने इसे त्याग दिया एवं पाटण आकर पूज्य श्री अभयदेवजी से शिक्षा ग्रहण की।

पाटण से चित्तौड़ आने पर चैत्यवासियों ने आपका बड़ा विरोध किया। आपको कालिकामता के मंदिर में ठहरना पड़ा। कई शास्त्रों की पकड़ एवं विद्धता से आपकी ख्याति बढ़ने लगी और यहाँ आपके कई उपासक बन गये। चैत्यवासियों की शास्त्र विरोधी एवं आचारी शिथिलता के विरुद्ध आपने आंदोलन छेड़ दिया। आपके सदुपदेश से भगवान महावीर के मंदिर का निर्माण हुआ, जिसकी भव्य प्रतिष्ठा संवत् 1167 में हुई। यही पर आपने संघ पट्टक, अष्ट सप्तिका धर्म शिक्षा, रूप प्रकरण, द्वादश कुलक आदि ग्रंथ लिखे। चित्तौड़ का राजा नरवर्मा आपकी विद्वता का कायल था। उसने महावीर मंदिर बनवाने में आर्थिक सहयोग किया था।

मुनिश्री अभयदेवसूरि आपको अपने बाद पट्टधर बनाना चाहते थे, लेकिन पूर्व चैत्यवासी होने के कारण इसका विरोध हुआ और वर्धमानसूरिजी को पट्टधर बनाया गया। थोड़े से समय के उपरान्त बहुत बड़े महोत्सव में आपको ही संवत् 1167 में पट्टधर बनाया गया।

पूज्य आचार्य श्री जिनवल्लभसूरिजी का देहावसान चित्तौड़गढ़ में संवत् 1167 की कार्तिक वदी 12 को हो गया। आपके पट्टधर के रूप में जिनदत्तसूरिजी को पट्टधर बनाया गया।

3. दादागुरू श्री जिनदत्तसूरि जी

श्रमण संस्कृति की गौरवशाली परम्परा में खरतरगच्छ के आचार्यों का योगदान सर्वाधिक है। उनकी विद्धता, आचरण, अलौकिक शक्तियाँ एवं कीर्तिमान है। इन्ही में से एक दादागुरू श्री जिनदत्तसूरि आचार्य जिनवल्लभसूरि के शिष्य थे। उनका जन्म गुजरात के धवलक (धोलका) नगर में वि. सं. 1132 में हुआ था। उनके पिताश्री गुजरात राज्य में आमात्य थे। उनके परिवार में सहज धार्मिक वातावरण था। उसका उन पर बहुत प्रभाव पड़ा और इन्ही संस्कारों के फलस्वरूप मात्र 9 वर्ष की बाल उम्र में उन्होनें धर्मदेवजी उपाध्याय से संयम पथ अंगीकार कर लिया और मुनि सोमचन्द्र बन गये। बाद में उन्होंने पोटण में पूज्य अभयदेवसूरि से शिक्षा प्राप्त की वैशाख वदी छठ सं. 1169 तदनुसार 1112 ई. में भगवान महावीर स्वामी के मंदिर के विशाल प्रांगण में देवभद्राचार्य जी ने उन्हें सूरि पद पर प्रतिष्ठित किया एवं जिनदत्तसूरि नाम से अलंकृत किया। इस प्रतिष्ठा समारोह की भव्यता का आभास आज हमें इसी से हो सकता है कि उस समारोह में धोलका नरेश अपनी मंत्री परिषद् सहित चितौड़गढ़ पधारे थे एवं चित्तौड़गढ़ श्रेष्ठी श्री भुवनपाल लक्ष्मणपाल दोशी ने स्वामीवात्सल्य का लाभ लिया था।

गुजरात की भूमि से शिथिलाचार के विरुद्ध चलाये गये अभियान को पूज्य जिनवल्लभसूरि एवं जिनदत्तसूरि ने पूरे देश में फैला दिया। आचार क्रांति आपका आदर्श बन गई थी और उसकी पूर्ति हेतु पूरे देश भर में दादाबाड़ियों की बाढ़ सी आ गई थी।

जैन धर्म के इतिहास में पहली बार किसी आचार्य ने 1 लाख 30 हजार नये श्रावक जैन धर्म में दीक्षित किये और राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ, माहेश्वरी आदि कई जातियों को ओसवाल जाति में सम्मिलित कर उन्हें विभिन्न गौत्रें प्रदान की। इस एक अकेली घटना का जैन धर्म के उन्नयन एवं उसकी सामाजिक स्वीकार्यता पर अद्भुत प्रभाव पड़ा।

चार दादागुरुओं में से एक श्री जिनदत्तसूरिजी को उनकी अलौकिक शक्तियों के कारण अधिक जाना गया जबकि यह तो उनके साधक जीवन की सहज उपलब्धि थी। उसके लिए उन्होंने न तो कोई उपक्रम किया न उन्हें इसकी अभीप्सा थी। उनका यथार्थ कार्य तो जैन धर्म को पुनः आचारसम्मत बनाकर शिथिलाचार से मुक्ति दिलाना था। इस कार्य हेतु उन्होंने कई शास्त्रों की भी रचना की।

दादागुरूेदव श्री जिनदत्तसूरिजी का कालधर्म वि. सं. 1211 की आषाढ़ सुदी 11 को अजमेर मंे हुआ। वहाँ पर भी चमत्कार होना था। अग्नि संस्कार के बाद गुरूदेव के शरीर पर औढ़ायी हुई चद्दर मुंहपत्ती एवं चोल पट्टा अग्नि में बिना जले ज्यों के त्यों बचे रहे, जो आज श्री जैसलमेर के जिनभद्रसूरि ज्ञान भण्डार में दर्शनार्थ उपलब्ध है।

4. आचार्य श्री विजयनीतिसूरि जी

परम पूज्य आचार्य श्री विजयनीतिसूरीश्वर बड़े विद्वान, प्रभावशाली एवं कर्मशील आचार्य थे। उन्होंने गिरनार का प्रथम जीर्णोद्वार करवाया तथा चित्तौड़गढ़ जैसी जैन संस्कार एवं गौरव भूमि में पुराने भव्य जिनालयों का जीर्णोद्धार एवं प्रतिष्ठाएँ करवाई। जैन धर्मशाला एवं केसरियाजी जैन गुरूकुल जैसी संस्थाओं की स्थापना करवाई जो आज अपने संस्थापक गुरु के आशीर्वाद से फल फूल रही है।

आचार्य श्री विजयनीतिसूरिश्वर का जन्म गुजरात के वांकानेर में सं. 1930 की पोष सुदी ग्यारस को हुआ था। आपका बचपन का नाम निहलाचंद एवं माताश्री एवं पिताश्री का नाम श्रीमती चैथीबाई एवं श्री फूलचन्द था। आप में दीक्षा का भाव इतना था कि जैन इतिहास में संभवतः पहली बार किसी ने कम उम्र के कारण, माता-पिता की आज्ञ दीक्षा हेतु नहीं मिलने पर स्वयं ने दीक्षा ग्रहण कर ली हो। दीक्षा का स्थान था महरवाड़। आपकी निष्ठा एवं समर्पण को देखकर सं. 1949 की आषाढ़ सुदी ग्यारस को मुनि श्री कीर्तिविजय जी ने आपको विधिवत दीक्षा प्रदान की एवं सं. 1950 की माघ सुदी चैथ को बड़ी दीक्षा प्रदान कर मुनि नीतिविजय नाम प्रदान किया। सं. 1961 में गणि पद, सं. 1962 में पन्यास पद एवं 1976 की मगसर सुदी ग्यारस को दीक्षा के 46 वर्ष बाद आप आचार्य पद पर विभूषित हुए। आचार्य श्री ने अपने जीवनकाल में कई अभूतपूर्व कार्य किये:- (1) सं. 1941 में अहमदाबाद से सिद्धावलजी तीर्थ निमित्त 3500 यात्रियों का संघ निकाला। (2) मालवा प्रवास में सैकड़ों तेरापंथी श्रावक मूर्तिपूजक बने। (3) अहमदाबाद एवं अन्य कई स्थानों पर उपाश्रय ज्ञान मन्दिर एवं प्रतिष्ठाएँ सम्पन्न करवाई। (4) पाटा में 1915 सं. में हेमचन्द्राचार्य ग्रंथावली की स्थापना की। (5) प्रभास पाटण, गिरनार एवं चित्तौड़गढ़ में जीर्णोद्धार करवाये। (6) सं. 1937 में मेवाड़ के तीर्थों के जीर्णोद्धार हेतु मेवाड़ जीर्णोद्धार समिति की स्थापना की। (7) पाटण, जामनगर, राधनपुर आदि स्थानों पर पाठशालाएँ स्थापित की।

आचार्य श्री की निश्रा में उनकी प्रेरणा से पंडित मफतलाल, पंडित वीरचंद भाई, पंडित प्रभुदास, पंडित ठाकोर जैसे जैन दर्शन के दिग्गज एवं समर्थ विद्धान जैन शासन को प्राप्त हुए। आचार्य श्री की निश्रा में प्रकाण्ड जैन विद्धान पंडित प्रभुलालजी ने पाटण में विद्या भुवन जैन पाठशाला प्रारंभ की, जिसमें भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल, मणिलाल कोठारी, काका कालेलकर, पंडित भगवानदास, पंडित सुखलाल एवं पंडित बेचरदास जैसे दिग्गज मार्गदर्शन हेतु पधारते थे। पंडित बेचरदस पंडित प्रभुलाल के पिताश्री एवं महात्मा गांधी की मातुश्री पुतलीबाई के गुरु थे जिन्होंने महात्मा गांधी को विदेश यात्रा से पूर्व मद्यपान एवं अन्य सभी बुराइयों से दूर रहने की सौगंध दिलाई थी।

चित्तौड़गढ़ आने पर आचार्य श्री ने इस जैन गौरव भूमि की तत्कालीन दुर्दशा देखकर यहाँ के जिन मंदिरों के जीर्णोद्धार का एवं जैन गुरूकुल एवं जैन धर्मशाला स्थापित करने का बीड़ा उठाया। श्री सात बीस देवरी मंदिर चित्तौड़गढ़ एवं श्रृंगार चंवरी के जीर्णोद्धार के पश्चात् प्रतिष्ठा का मुहूर्त निकाला और प्रतिष्ठा हेतु रणकपुर से चित्तौड़गढ़ रवाना हुए लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था। एकलिंगजी पहुँचने पर पाष वदी तीज सं. 1998 को अचानक आपका देवलोकवास हो गया। आपका दाह संस्कार आयड़ उदयपुर में किया गया। चित्तौड़गढ़ की यह जैन गौरव भूमि आचार्य श्री विजय नीति सूरीश्वर जी के सुकार्यो के प्रति नतमस्तक एवं ऋणी रहेगी।

5. पद्मश्री मुनि श्री जिनविजय जी

पुरातत्व एवं शेध प्राच्य व विधाओं के महामनीषी पदम्श्री मुनि श्री जिनविजय का जन्म 27 जनवरी सन् 1888 को राजस्थान प्रदेश के भीलवाड़ा जिले के रूपाहेली गाँव में हुआ था। 12 वर्ष की बाल उम्र से ही मुनिजी ने घर-बार छोड़कर साधु जीवन स्वीकार कर लिया था। मुनिजी ने बिना किसी औपचारिक शिक्षा के स्वाध्याय से अर्जित अपने ज्ञान एवं विवेक बल से इतनी शक्ति एवं मेधा का आकर्षण अर्जित कर लिया था कि वे अपने समय के राजनैतिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं सामाजिक क्षेत्र की शीर्ष हस्तियों के प्रिय पात्र बन गये थे। महात्मा गाँधी, राजगोपालाचारी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, के.एम. मुन्शी, तिलक, जर्मनी के हर्मन जैकोबी, शुब्रिंग आदि के साथ उनके घनिष्ठ सम्बन्ध बन गये थे। सामान्य से अति विशिष्ट बनने की उनकी यह यात्रा अपने आप में अप्रतिम एवं प्रेरणास्पद है। जैन साहित्य की शताब्दियों पुरानी विरासत एवं राजस्थान, गुजरात आदि प्रान्तों में उपलब्ध नष्ट प्रायः हस्तलिखित साहित्य को प्रकाश में लाने एवं संरक्षित करने का भागीरथ प्रयास कर मुनि श्री ने जैन संस्कृति को युगों-युगों के लिए अमर कर दिया है। साथ ही राष्ट्रीय गौरव की कई संस्थाओं को स्थापित करने एवं प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय भी मुनिजी की अप्रतिम प्रतिभा, लगन एवं निष्ठा को जाता ळै।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के आह्वान पर देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में भी मुनि जी सक्रिय रूप से जुडे एवं इस हेतु आवश्यकतानुरूप अपना मुनि वेश तक त्याग दिया।

1444 ग्रंथों के रचयिता एवं चित्तौड़गढ़ के महान आचार्य श्री हरिभद्र सूरिजी के प्रति मुनिजीका विशेष लगाव एवं अनूठी श्रद्धा थी। इसी श्रद्धा के फलस्वरूप मुनिजी ने अपनी स्व-अर्जित पूँजी से ‘‘श्री हरिभद्रसूरि स्मृति-मन्दिर’’ का निर्माण चित्तौड़गढ़ में करवाया।

किसी आचार्य के कृतित्व को भारतवर्ष के इतिहास में यह अनूठी आदरांजलि है।

मुनिजी का देवलोक अहमदाबाद में 3 जून 1976 को हुआ लेकिन चित्तौड़ की पावन धरा को आदर देते हुए उनकी इच्छानुसार उनका अन्तिम संस्कार चित्तौड़गढ़ में उन्हीं के द्वारा निर्मित सर्व देवायतन आश्रम चंदेरिया, चित्तौड़गढ़ में किया गया। इस मनीषी, कर्मयोगी देवपुरुष को शत-शत नमन।

6. युगपुरूष श्री समीरमुनि जी म. सा.

इतिहास में जैन मुनियों ने क्रूर से क्रूर व्यक्तियों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन करने के कई उदाहरण प्रस्तुत किये है। मुनि श्री हीरविजय जी म. सा. द्वारा अकबर जैसे क्रूर शासक जिसने चित्तौड़गढ़ किले में कथित रूप से 30 हजार स्त्री-पुरूषों का कत्ल करवाया था, को अपने जीवन के अन्तिम 22 वर्षों में पूर्ण अहिंसक शासक के रूप में परिवर्तित कर दिया था। इसी तरह आचार्य रत्नप्रभसूरि ने अपने सदुपदेश से ओसियां गाँव के समस्त हिंसक जाति समूहों को जैन धर्म में दीक्षित कर पूर्ण अहिंसक बना दिया था। आज वे ही लोग देश-विदेश में ओसवाल जैन के रूप में अपना परिचय देते है।

ऐसा ही एक अद्भुत कार्य 20 वी शताब्दी में युगपुरूष श्री समीर मुनिजी म. सा. ने किया था। उन्होंने 1 मई, 1958 को दलित, अबोध एवं क्रूरतम हिंसक समाज के अन्तर्मन में अहिंसा की दीपशिखा प्रज्वलित कर उन्हें ‘वीरवाल’ नाम प्रदान कर एक नये अहिंसक ‘वीरवाल समाज’ की स्थापना की थी। मुनिजी ने एक ऐसे समाज को अहिंसक बनाने का व्रत लिया था, जो भयंकर हिंसक समाज था। रोज-रोज हजारों नये जीवों के रक्त से रंजित छूरियाँ, जिनके हाथों को लाल किये रहती थी, हजारों जीवों को रोज बड़े शहरों में कत्ल के लिए भेजना इनका रोजगार था। शाम होते ही शराब के नशे में धुत होना, इनकी दैनिक चर्या थी। शराब के नशे में घर परिवार सब उजड़ रहे थे। माँ बहिनों की जिन्दगी नर्क से भी बदतर थी। ऐसे परिवारों में जाना और जाकर उन्हें एक अच्छी जिन्दगी की तरफ मोड़ना ऐसा दुष्कर कार्य था, जिसकी कल्पना करना भी कठिन है। पर यह भगवान महावीर के शासन की कठोरतम सेवा थी, जिसे समीर मुनिजी ने अपने अडिग निश्चय एवं अहिंसा की अमोघ शक्ति से संभव बनाया। उनके समाज उत्थान के कार्य की अनुमोदना स्वरूप तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री मोहनलाल सुखाड़िया ने चित्तौड़गढ़ में 20 एकड़ जमीन प्रदान की एवं दिनांक 3.4.66 को स्वयं पधारकर इस भूमि पर ‘अहिंसा नगर’ की स्थापना की। ऐसे महामना श्री समीरमुनि जी म. सा. का कालधर्म 65 वर्ष की अल्प आयु में दिनांक 26 फरवरी, 1980 को मन्दसौर में हुआ। इस युगपुरूष को शत्-शत् वन्दन! अभिवन्दन !!

7. पूज्या श्रीमती कमला माताजी

मुनिवर श्री समीरमुनि जी म. सा. के क्रान्तिकारी विचार को कार्य परिणति देने मंे इन्दौर निवासी श्रद्धेय स्व. कमला माताजी का बहुत योगदान रहा। वे वीरवाल समाज के उत्थान हेतु जीवनपर्यन्त कार्य करती रही। उनके इसी माँ सदृष्य स्नेह के कारण वीरवाल समाज में वे ‘माताजी’ के उपनाम से भी जानी जाती थी। वे जहाँ भी रहती थी, वह स्थान एक तीर्थस्थान बन जाता था। उनका जीवन किसी सिद्ध तपस्वी साध्वी से कम नहीं था। उनका देहावसान 22 अगस्त, 2005 को इन्दौर मंे हुआ। ममतामी कमल माताजी को शत्-शत् नमन !

<< 3. पूजित जिन मंदिर5. दानवीर जैन श्रेष्ठी >>


Chapters (चित्तौड़गढ़ & जैन धर्म)

  1. जैन धर्म का गौरव स्थल
  2. जैन श्रद्धालु
  3. पूजित जिन मंदिर
  4. महान जैन आचार्य
  5. दानवीर जैन श्रेष्ठी
  6. चित्तौड़ में रचित जैन साहित्य
  7. शिलालेख एवं प्रशस्तियाँ
  8. रोचक एवं ऐतिहासिक तथ्य
  9. परिशिष्ट
  10. चित्तौड़गढ़ दुर्ग का गाइड मेप
  11. भक्तिमती मीराबाई
  12. जैन धर्मशाला
  13. श्री केसरियाजी जैन गुरूकुल

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