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1. दिनेश कुमार बोराणा   I Like It. |Report Abuse|  Link|May 30, 2017 9:09:46 PMReply
देसुरी (देवसुरी) / Desuri : देसुरी गांव का नाम ‘देवसुरी’ था, जिसका प्रमाण जैन पेढी पर अंकित है। ‘श्री ॠषभदेव भगवान जैन पेढी देवसुरी एवं पंचायत भवन’ नाम था। भगवान के तिगडे पर भी लेख में देवसुरी गांव अंकित है। कालक्रम में यह अपभ्रंश होकर देसुरी हो गया। वि. स. १८३० तक ठाकुर वीरमदेव सोलंकी का देसुरी पर राज्य था और यह मारवाड के अधीन था।
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अरावली पर्वत की तराई में हरियाली से भरपूर नोमा व सुखडी नदी या बडी नदी के मध्य व जोधपुर उदयपुर मेगा हाईवे क्र. १६ की मुख्य सडक पर स्थित है देसुरी अर्थात प्राचीन देवसुरी नगर। मारवाड व मेवाड को जोडने वाला ऐतिहासिक गावं ,वीरों व संतों का गांव, जोधपुर डिवीजन व पाली जिले में गोडवाड का प्रथम गांव देवसुरी इतिहास प्रसिद्ध राठौड व राणाओं का आधिपत्यवाला गांव रहा।

देसुरी गांव का नाम ‘देवसुरी’ था, जिसका प्रमाण जैन पेढी पर अंकित है। ‘श्री ॠषभदेव भगवान जैन पेढी देवसुरी एवं पंचायत भवन’ नाम था। भगवान के तिगडे पर भी लेख में देवसुरी गांव अंकित है। कालक्रम में यह अपभ्रंश होकर देसुरी हो गया। वि. स. १८३० तक ठाकुर वीरमदेव सोलंकी का देसुरी पर राज्य था और यह मारवाड के अधीन था।

वीर वंशावली में सतरवें आ. श्री वृद्ध देवसुरी हुए। आप श्री ओसिया नगर से उग्र विहार कर , वीर संवत् ५८५ में ३०० श्रावकों के साथ नाडुलाई होकर देवसूरी किनारे पर श्रावकों को बसाया। उस गांव के श्रावकों द्वारा बसा हुआ गांव देवसुरी कहलाया। आज देसुरी में ‘नोमा माता’ का मंदिर है, जो शिल्प एवं कला की दृष्टि से जैन देरासर है। इन सभी से ज्ञात होता है कि कल का देवसुरी ही आज का देसुरी है। वीर दुर्गादास राठौड का ससुराल देसुरी में था।

मास्टर छोटालालजी शर्मा के अनुसार, यहां का इतिहास देसुरी पर शासनकर्ता थे बोरणा राजपूत इन्हीं के दो भाईयों के नाम थे देवसिंह (देवा) व सुरसिंह (सूरा)। इन्हीं दोनों के नाम पर गांव का नाम पडा देवसूरी। बोरणा ठाकुरों द्वारा बसाया गया देवसूरी का मूल गांव नोमा माता मंदिर के उत्तर में स्थित था। ठाकुर साहब के दो पुत्रों के साथ चार पुत्रियां थीं। जो इतिहास के अनुसार समाधि में स्थिर होकर बाद में देवियां बन गईं। क्रमश: रेवलीबाई – रेली माता नवलीबाई – नोमा माता, जो बोराणा जैन व ठाकुरों की कुलदेवी कही जाती है, तीसरी चौथीबाई – चौधरा माता – उन्हें छत्तीस कौम वाले उनकी कसम व मानता मानते हैं, चतुर्थ शैलीबाई शेली माता, आज जहां इनका मंदिर हैं, वह जगह शैली माता के चमत्कार के रूप में प्रसिद्ध है आस-पास कहीं पानी की धारा नहीं बहती मगर मंदिर के पास १२ महीने पानी की धारा बहती रहती है।

बोरणा ठाकुरों के पश्चात देवसुरी पर मादरेसा चौहान का राज आया, जो मेवाड के महाराणाओं के मातहत थे, इसलिए उन दिनों देसुरी मेवाड का भाग बन गया। देसुरी की नाल से ही सिर्फ मेवाड़ में प्रवेश होता था। इस कारणवश बाद में महाराणा ने मदरेसा चौहान के भानजे सोलंकियों को देसुरी का राजभार दे दिया। सोलंकियों ने अपने मामा मादरेसा चौहानों की षडयंत्र द्वारा हत्या करवाके देसुरी पर अपना आधिपत्य जमाया।

सोलंकियों ने अपना महल (रावला) अलग से बनवाया, जिसमें आज देसुरी तहसील व मुन्सिफ कोर्ट है। सोलंकियां ने अपने राज्य का विस्तार उत्तर में सोमेसर व बुसी हनुमानजी मंदिर तक किया था। इन्होंने सुमेर की नाल में मुगल बादशाह औरंगजेब को परास्त किया था। सोलंकी भी मेवाड महाराणा के अधीन थे।

उस समय जोधपुर पर महाराजा जसवंसिंहजी विराजमान थे। एक समय रात के दूसरे पहर में महाराजा व महारानी किले के प्राचीर पर बैठकर बातें कर रहे थे, उस समय अरावली पर्वत पर रानीजी को एक दीपक जलता हुआ दिखा। रानी जी बोली कि ऐसा भी कोई राजा है, जिसके राज में अभी तक दीपक जल रहा है। महाराजा को यह बात सहन नहीं हुई और उन्होंने रानी को देशनिकाला दे दिया। महारानी अपनी दासियों के साथ दीपक की सीध में निकल पडी, जो कुम्भलगढ पर जल रहा था। आप कुम्भलगढ पहुँचकर महाराणा को पूरी दास्तान सुनाई। महाराणा ने इन्हें बेटी बनाकर शरण दी। दूसरी ओर जोधपुर महाराजा को जब इस बात की खबर लगी तो वे कुम्भलगढ पर आक्रमण करने निकल पडे।

देसुरी के बाहर घाणेराव के नाके पर मुकाबले की ठानी, लेकिन कुम्भलगढ ऊंचाई पर होने से जीतना असंभव सा लगा। उधर, रानी ने महाराजा को संदेश भेजा कि झाडी कटाई झाली मिले, रण कटाये राज। कुम्भलगढ रा कांगरे राजा मच्छर वे ने आव। संदेश पढकर महाराज ने महाराणा को कहलवाया कि आप मेरी झाली रानी को वापस जोधपुर भेज दें। मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। तब महाराणा का दूत संदेश लेकर आया कि आप जमाईराजा बनकर कुम्भलगढ पधारियें। मेरी पुत्रियों को सहर्ष विदा-करूंगा। महाराजा के पधारने पर शाही स्वागत हुआ। महाराणा ने दहेज के बतौर हाथी घोडे नौकर चाकर, हीरे जवाहरात व देसुरी का पूरा आंवल विभाग महाराजा को दे दिया। इस पर सीमा निर्धारण का फार्मूला इस प्रकार रहा आंवल-आंवल राणाजी, बावल-बावल राजाजी। बाद में जोधपुर महाराजा ने देसुरी को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया, भव्य महल बनाये। जोधपुर महाराज को ‘नवकोटि’ महाराज की पदवी थी। यहां कुल चार जैन मंदिर हैं। सभी संप्रतिकालीन हैं।